रसूलपुरमिठ्ठी बेरी में प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआआयोजन
कार्यशाला के मुख्य अतिथि रहे ग्राम प्रधान कमलेश द्विवेदी
लालढांग/ हरिद्वार
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (VCSG UUHF), भरसार के अंतर्गत कार्यरत कृषि विज्ञान केन्द्र (KVK), रानीचौरी, टिहरी गढ़वाल द्वारा शनिवार को रसूलपुर मिठ्ठी बेरी गाँव में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। “उत्तराखण्ड की आर्थिक समृद्धि हेतु प्राकृतिक खेती” विषय पर आधारित यह कार्यशाला भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की जनजातीय उप-योजना (TSP) के अंतर्गत आयोजित की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ ग्राम प्रधान कमलेश द्विवेदी व अन्य अतिथियो के स्वागत और मार्गदर्शन में हुआ। कार्यशाला में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने स्थानीय किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर बल दिया । प्रो. अमोल वशिष्ठ, सहनिदेशक शोध* ने प्राकृतिक खेती के परिचय और महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में प्राकृतिक खेती पर चल रहे अनुसंधानों से यह सिद्ध हुआ है कि गौ-आधारित आदानों और सूक्ष्मजीवों के उपयोग से मिट्टी की जैविक कार्बन मात्रा बढ़ती है और दीर्घकालिक उत्पादकता सुनिश्चित होती है। प्रो. वशिष्ठ ने कहा कि रासायनिक खेती से बिगड़े मृदा स्वास्थ्य को सुधारने में प्राकृतिक खेती ही एकमात्र टिकाऊ विकल्प है, जो जल संरक्षण और जैव विविधता को भी बढ़ावा देता है। कार्यशाला प्रो. परविंदर कौशल, माननीय कुलपति /निदेशक प्रसार के कुशल मार्गदर्शन एवं निर्देशानुसार* आयोजित की गई। माननीय कुलपति महोदय के विजन के अनुरूप इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य मिट्टी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना, संतुलित उर्वरक प्रबंधन एवं प्राकृतिक खेती द्वारा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना, किसानों की लागत कम कर मुनाफे को बढ़ाना और पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र* को बनाए रखना था, क्योंकि प्राकृतिक खेती राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।डॉ. अरुणिमा पालिवाल, वैज्ञानिक ने खरीफ फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने के गुर सिखाए। प्रशिक्षण के दौरान डॉ. आलोक यवले, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केंद्र ने प्राकृतिक खेती की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा की। डॉ. योगेश नेगी, सहप्राध्यापक* ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के सिद्धांतों की जानकारी दी।
डॉ. सचिन कुमार, विषय वस्तु विशेषज्ञ (पादप सुरक्षा) एवं कोर्स समन्वयक, केवीके रानीचौरी ने कार्यशाला का सफल संचालन एवं समन्वय किया। उन्होंने बताया कि भारत सरकार की PM-PRANAM योजना (PM Programme for Restoration, Awareness, Nourishment and Amelioration of Mother Earth) का उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाकर प्राकृतिक पोषक प्रबंधन को बढ़ावा देना है। खरीफ फसलों में रोग एवं कीट प्रबंधन के प्राकृतिक तरीकों के साथ-साथ मिट्टी में सूक्ष्म एवं वृहद पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने की विधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर पोषक तत्वों की कमी पहचानने और जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक घोलों से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश की पूर्ति करने की विधि सिखाई।
कार्यक्रम के अंत में इस कार्यक्रम के द्वारा संचालित कृषक परामर्श सत्र में किसानों की समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया गया।
कार्य क्रम में ग्राम प्रधान कमलेश द्वेवेदी , डाॅ० विनोद जोशी क्षेत्रीय प्रबंधक IFFCO व मोहित कुमार विकास खण्ड प्रभारी,आदि सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय किसान उपस्थित रहे।




